न जाने किसका कबीला तलाश करता
हैफकीर शहर का नक्शा तलाश करता है,
मिटा के रात की तारिकियाँ, ये सूरज
भीजमीन पे अपना ही साया तलाश करता है,
बना के खंदके हर सिम्त अपने हाथों से
अजीब शख्स है रास्ता तलाश करता है,
मैं जानता हू मेरी प्यास पर तरस खाकर
वो मेरी आखों मे एक दरिया तलाश करता है,
खलील... आज वो आईने बेचनेवाला...
कुवें मे झांककर अपना ही, चेहरा तलाश करता है....