Wednesday, December 12, 2007

सजेगी तेरे मेरे अरमानो की सेज



चाहत है उस शाम की

जब हो सिर्फ़ हो हम और तुम

हाथों में हाथ लिए

एक दूसरे में हो जाए गुम

मदमस्त करता हवा का झोका

और नीले झील का किनारा

चंदा संग चँदनी की किरने

बन जाए हम एक दूसरे का सहारा

होठों से कुछ ना कह कर भी

नज़रों ही नज़रों में सब कहना

दिल की राहों पर चलते हुए

मन ही मन मुस्कुराते रहना

सिर्फ़ कल्पना से ही बस

धड़कने हो जाती है तेज़

अब मुझे इंतज़ार है उस शाम का

सजेगी तेरे मेरे अरमानो की सेज

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